kya vaikriya labdhi se stri bhi poore shulakdhyan ko pa sakte hai?
नहीं, वैक्रिय लब्धि से अपने-आप पूर्ण शुक्लध्यान प्राप्त नहीं होता। शुक्लध्यान लब्धि का फल नहीं, बल्कि अत्यंत निर्मल आत्म-परिणाम और कर्मक्षय का परिणाम है।
सरल रूप में:
- वैक्रिय लब्धि = विशेष ऋद्धि/शक्ति, जैसे शरीर को बदलने की क्षमता।
- शुक्लध्यान = आत्मा की बहुत ऊँची विशुद्ध अवस्था, जो कर्मों के अत्यंत क्षीण होने पर होती है।
- इसलिए शक्तियाँ होने से ध्यान की सिद्धि नहीं होती; ध्यान की सिद्धि सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र और कषायों के क्षय से होती है।
स्त्री के विषय में:
- श्वेताम्बर परंपरा में स्त्री मोक्ष और उच्च ध्यान की अधिकारी मानी गई है।
- दिगम्बर परंपरा में स्त्री-शरीर से उसी जन्म में मोक्ष नहीं माना गया, इसलिए वहाँ शुक्लध्यान की व्याख्या भी उसी दृष्टि से की जाती है।
अर्थात्, वैक्रिय लब्धि हो या न हो, शुक्लध्यान का आधार आत्मशुद्धि है, लब्धि नहीं।