Tijaypahut stotra arthsahit
त्रिजयपाहुड स्तोत्र का अर्थ सहित संक्षिप्त रूप नीचे दिया गया है। इस स्तोत्र में भगवान, गुरु और धर्म की जय की भावना व्यक्त की गई है। पाठ-भेद परंपरा के अनुसार हो सकते हैं।
मूल भाव
- त्रि = तीन
- जय = विजय
- पाहुड = प्रकरण / स्तवन / गाथाओं का संग्रह
अर्थात यह स्तोत्र तीन प्रकार की जय—
- अरिहंत की जय,
- सिद्ध की जय,
- आचार्य-उपाध्याय-साधु रूप धर्म की जय
की भावना से युक्त स्तवन है।
भावार्थ
- जो राग, द्वेष, मोह को जीत चुके हैं, वे अरिहंत हैं।
- जिन्होंने संसार के बंधन पूर्णतः तोड़ दिए हैं, वे सिद्ध हैं।
- जिनके मार्गदर्शन से जीव सम्यक् ज्ञान, दर्शन और चारित्र प्राप्त करता है, वे गुरु हैं।
- जिनके उपदेश से अहिंसा, संयम, सत्य और अपरिग्रह की साधना होती है, वही जैन धर्म का वास्तविक तेज है।
- इस स्तोत्र में साधक भगवान, गुरु और धर्म की शरण लेकर शुद्ध जीवन की प्रार्थना करता है।
संक्षिप्त अर्थ
“मैं अरिहंत, सिद्ध और साधु-धर्म की वंदना करता हूँ। जो आत्मा को पवित्र करें, मोक्षमार्ग दिखाएँ, और संसार के दुःखों से छुड़ाएँ—उनकी जय हो।”यदि आप चाहें, तो मैं त्रिजयपाहुड स्तोत्र का पूरा पद्य-पाठ अर्थ सहित भी दे सकता हूँ।