Khaya Muniya veshya Na Ghar mein Rahane Keval Gyan prapt hetu
यदि आपका आशय किसी मुनि के वेश्या-गृह में रहने और वहीं केवळज्ञान प्राप्त होने की कथा से है, तो जैन दृष्टि से इसका अर्थ यह है:
- केवळज्ञान स्थान से नहीं, कर्म-क्षय से होता है।
- मुनि के लिए बाहरी स्थान पवित्र या अपवित्र कारण नहीं बनता; मुख्य कारण होता है अंतरंग शुद्धि, समभाव, और मोह का पूर्ण क्षय।
- कभी-कभी पूर्वकर्मों के उदय के कारण मुनि को ऐसी विषम परिस्थितियाँ मिलती हैं, लेकिन यदि वे लेशमात्र भी राग-द्वेष से रहित रहते हैं, तो वहीं केवळज्ञान प्रकट हो सकता है।
- जैन धर्म में यह भी सिखाया गया है कि साधु की साधना बाहरी वातावरण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आत्मा की पूर्ण विशुद्धि पर निर्भर करती है।
अर्थात, वेश्या-गृह में रहना केवळज्ञान का कारण नहीं, केवल निमित्त हो सकता है; वास्तविक कारण कर्मों का नाश है।
यदि आप चाहें तो मैं इस विषय को किसी विशेष जैन कथा या सूत्र के संदर्भ में भी सरल भाषा में समझा सकता हूँ।