Apratyaksh gyaan kya hai ?
जैन दर्शन में ज्ञान (ग्यान) को विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया गया है। "अप्रत्यक्ष ज्ञान" (Apratyaksh Gyaan) का अर्थ है—ऐसा ज्ञान जो प्रत्यक्ष नहीं है, अर्थात् जो इंद्रियों या मन द्वारा सीधा अनुभव/प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त नहीं होता, बल्कि किसी माध्यम, संकेत, प्रमाण आदि के द्वारा जाना जाता है।
जैन आगमों के अनुसार, ज्ञान के पांच प्रकार होते हैं:
- मति ज्ञान (इंद्रियों और मन से प्राप्त ज्ञान)
- श्रुत ज्ञान (शास्त्र/वाणी आदि से प्राप्त ज्ञान)
- अवधि ज्ञान (सीमित वस्तु का अलौकिक ज्ञान)
- मन:पर्यय ज्ञान (दूसरे के मन के भाव जानना)
- केवल ज्ञान (सर्वज्ञता)
इनमें से, मति ज्ञान और श्रुत ज्ञान को "अप्रत्यक्ष ज्ञान" (Apratyaksh Gyaan) कहा जाता है, क्योंकि ये ज्ञान साधनों (इंद्रियाँ, मन, शब्द आदि) के माध्यम से प्राप्त होते हैं, प्रत्यक्ष नहीं होते। जबकि अवधि, मन:पर्यय और केवल ज्ञान को "प्रत्यक्ष ज्ञान" (Pratyaksh Gyaan) कहा जाता है, क्योंकि ये बिना किसी बाह्य माध्यम के सीधे आत्मा द्वारा प्राप्त होते हैं।
सारांश: अप्रत्यक्ष ज्ञान वह ज्ञान है, जो इंद्रियों, मन या शब्द आदि के माध्यम से, यानी परोक्ष रूप में प्राप्त होता है, प्रत्यक्ष रूप से नहीं। जैन दर्शन में मति ज्ञान और श्रुत ज्ञान को अप्रत्यक्ष ज्ञान माना गया है।