Gotra kele jane
जैन धर्म में गोत्र का अर्थ कुल, वंश, या सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा कर्म है। यह अष्ट कर्मों में से एक है।
गोत्र कर्म के दो भेद माने जाते हैं:
- उच्च गोत्र कर्म — जिससे जीव को श्रेष्ठ कुल, सम्मान, और मान मिलता है।
- नीच गोत्र कर्म — जिससे जीव को नीच कुल, अपमान, या तुच्छ स्थिति मिलती है।
मुख्य बात: गोत्र कर्म जीव को जन्म के समय कुल, मान-अपमान, और सामाजिक स्थिति से जोड़ता है। लेकिन जैन धर्म में आत्मा की शुद्धि के लिए गोत्र से अधिक महत्वपूर्ण सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र हैं।
यदि आप चाहें, मैं गोत्र कर्म का विस्तृत जैन अर्थ सरल भाषा में बता सकता हूँ।