Kya Pran shabdon mein dvadashngi samay se
"Pran" (प्राण) शब्द का अर्थ है जीवन शक्ति या प्राण ऊर्जा। जैन धर्म के अनुसार, सभी जीवों में प्राण होते हैं, और इन्हीं प्राणों के आधार पर जीवों की रक्षा करने का उपदेश दिया गया है। द्वादशांगी (द्वादशांगिनी) जैन आगमों का मूल संग्रह है, जिसमें भगवान महावीर के उपदेश संकलित हैं। द्वादशांगी को श्रुतज्ञान का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण रूप माना जाता है।
द्वादशांगी के विभिन्न अंगों में प्राण, जीव, अजीव, पंचेन्द्रिय, हिंसा-अहिंसा, और जीवों की रक्षा के बारे में विस्तार से बताया गया है। विशेष रूप से, "आचारांग सूत्र" और "सूत्रकृतांग सूत्र" में प्राणों की परिभाषा, भेद, और उनके महत्व पर चर्चा की गई है। इन आगमों के अनुसार, जीव के मुख्यतः 10 प्राण माने गए हैं:
- इन्द्रिय प्राण (5) – स्पर्श, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रवण
- बल प्राण (3) – वचन बल, मनोबल, कायबल
- आयु प्राण (1)
- श्वासोच्छ्वास प्राण (1)
इन प्राणों की रक्षा करना, उनमें हिंसा न करना, तथा सभी जीवों में प्राणों की समानता को समझना जैन धर्म का मूल सिद्धांत है, जो द्वादशांगी ग्रंथों में भी प्रतिपादित है।
इस प्रकार, "प्राण" शब्द और उसकी व्याख्या द्वादशांगी (जैन आगम) के समय से ही प्रचलित है और इसका विस्तार से उल्लेख किया गया है।