Shrayansh nath bhagwan ki katha
श्री श्रेयांसनाथ भगवान् जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर हैं। इनकी कथा इस प्रकार है:
बाल्यकाल और जन्म: भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में, सिंहपुर नगरी (वर्तमान में श्रावस्ती) के राजा विष्णु और रानी विशुकि के यहाँ हुआ था। इनका जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ। जन्म के समय समस्त नगर में हर्ष की लहर दौड़ गई और दिव्य चमत्कार प्रकट हुए।
राज्याभिषेक और वैराग्य: युवावस्था में श्रेयांसनाथ का राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया। लेकिन एक दिन उन्होंने जीवन की नश्वरता और संसार के दुःखों का गहन चिंतन किया, जिससे उनमें वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने राज्य, परिवार और भोग-विलास का त्याग कर दीक्षा ले ली।
तपस्या और केवलज्ञान: श्रेयांसनाथ भगवान् ने घोर तपस्या की। दीक्षा के पश्चात मात्र कुछ वर्षों में ही उन्हें 'केवलज्ञान' (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई। केवलज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने अनेक वर्षों तक धर्म का उपदेश दिया, जिससे असंख्य जीवों का कल्याण हुआ।
निर्वाण: अंत में, श्रेयांसनाथ भगवान् ने सम्मेद शिखर (पारसनाथ पर्वत) पर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
विशेष तथ्य:
- श्रेयांसनाथ जी का चिह्न (लांछन): गेंहूँ का बाला (रक्तवर्णी)
- यक्ष: मणिभद्र
- यक्षिणी: सायंद्रिका
- इनका रंग: स्वर्ण वर्ण (गोल्डन)
- इनका चिह्न: गेंहूँ का बाला
महत्त्व: भगवान् श्रेयांसनाथ का जीवन त्याग, तपस्या और अहिंसा का आदर्श है। उनके उपदेशों में अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतिपादन है।
श्रेयांसनाथ भगवान् की कथा जैन धर्मावलम्बियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उनकी पूजा विशेष रूप से चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को की जाती है।