पुष्प पूजा दोहा
उत्तर
पुष्प पूजा का दोहा यह है:
“सुरभि अखण्ड कुसुम ग्रही, पूजो गत संताप।
सुमजंतुभव्य ज परे, करिये समकित छाप॥” (
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अर्थ
इस दोहे का भाव है कि सुगंधित और अखंड फूल अर्पित करके जिनेन्द्र भगवान की पूजा की जाती है, और उनसे अपने जीवन में सम्यक् दृष्टि की छाप बसाने की प्रार्थना की जाती है। (
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Spiritual Understanding
पुष्प पूजा हमें यह सिखाती है कि जैसे फूल अपनी सुगंध और कोमलता से सबको आनंद देता है, वैसे ही हमारा आचरण भी मधुर, पवित्र और निर्वैर होना चाहिए। (
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Takeaway
पुष्प केवल अर्पण की वस्तु नहीं, बल्कि उत्तम आचरण का प्रतीक है। (
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