1. नमन ने मोक्षमार्ग प्रकाशक के प्रथम दो अधिकारों का अध्ययन प्रारम्भ किया। अध्ययन के दौरान उसे अनेक ऐसे प्रसंग और उदाहरण मिले जिनसे उसके सोचने और जीवन को देखने का दृष्टिकोण बदल दिया। मोक्षमार्ग प्रकाशक के प्रथम दो अधिकारों से कोई ऐसे पाँच प्रसंग या उदाहरण
उत्तर
नीचे एक आदर्श उत्तर दिया जा रहा है। इसमें मैंने मोक्षमार्गप्रकाशक के पहले अधिकार (पीठबंध प्ररूपणा, जिसमें अरहंत और सिद्धों का स्वरूप आता है) और दूसरे अधिकार (संसार-अवस्थाका स्वरूप) की शिक्षाओं के आधार पर पाँच प्रसंग/उदाहरण चुने हैं। इन दोनों अधिकारों में आत्मा, परद्रव्य, कर्मबन्ध, संसार-दुःख, और मोक्ष के मार्ग की चर्चा मिलती है। ( forum.jinswara.com)Explanation
- अरहंत और सिद्ध भगवान का शुद्ध स्वरूप
पहले अधिकार में अरहंतों और सिद्धों के स्वरूप का सुंदर वर्णन है। वहाँ बताया गया है कि वे गृहस्थ-जीवन छोड़कर, घातिकर्मों का नाश करके अनंतचतुष्टय को प्राप्त हुए, और सिद्धों के साथ सभी परद्रव्यों का संबंध छूट गया। यह प्रसंग मुझे इसलिए बहुत प्रभावित करता है क्योंकि यह जीवन का सर्वोच्च आदर्श सामने रखता है। इससे यह समझ आता है कि शरीर, पद, वैभव और संसार की उपलब्धियाँ अंतिम सत्य नहीं हैं; आत्मा का शुद्ध स्वरूप ही वास्तविक लक्ष्य है। यही भेद-विज्ञान की पहली प्रेरणा देता है कि मैं अपने आप को शरीर या बाहरी पहचान न मानूँ। ( forum.jinswara.com)
- जीव का स्वभाव चैतन्य है, शरीर नहीं
दूसरे अधिकार में स्पष्ट किया गया है कि जीव का स्वभाव चैतन्य है, और वह सब पदार्थों को प्रकाशित करने वाला है; ज्ञान वस्तु को विशेष रूप से जानने की शक्ति है। साथ ही यह भी बताया गया है कि इन्द्रियाँ ज्ञान में सहायक हैं, पर स्वयं जीव नहीं हैं। यह प्रसंग मुझे इसलिए प्रभावित करता है क्योंकि इससे आत्मा और शरीर का भेद बहुत स्पष्ट हो जाता है। आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा केवल साधन हैं; “मैं” इनसे अलग जानने वाला चेतन तत्त्व हूँ। इसी से भेद-विज्ञान दृढ़ होता है। ( mmpclass.blogspot.com)
- ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म से ज्ञान का ढक जाना
ग्रंथ में बताया गया है कि जीव में ज्ञान की शक्ति बहुत है, लेकिन ज्ञानावरण के उदय से वह कमजोर या अप्रकट हो जाती है; इसी प्रकार दर्शनावरण भी चैतन्य की पूर्ण अभिव्यक्ति को रोकता है। यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है, क्योंकि इससे दोष का कारण आत्मा में नहीं, कर्मावरण में समझ में आता है। इससे यह भाव जागता है कि आत्मा मूलतः अपूर्ण या अशुद्ध नहीं, बल्कि कर्मों से आच्छादित है। यह दृष्टि भेद-विज्ञान को मजबूत करती है, क्योंकि तब मैं कर्म को आत्मा मानने की भूल नहीं करता। ( mmpclass.blogspot.com)
- मिथ्यात्व संसार का अंधकार है
दूसरे अधिकार में संसार को मिथ्यात्व रूपी अंधकार से ग्रस्त बताया गया है, और यह भी समझाया गया है कि बन्धन में पड़ा जीव व्याकुल रहता है। यह प्रसंग मुझे इसलिए प्रभावित करता है क्योंकि यह बताता है कि दुःख का मूल बाहर नहीं, भीतर की विपरीत मान्यता है। जब मैं “जो मेरा नहीं है उसे मेरा मान लेता हूँ,” तभी संसार बढ़ता है। इस प्रसंग से भेद-विज्ञान इसलिए प्रबल होता है कि मैं पदार्थों को यथार्थ रूप में देखने लगता हूँ—शरीर शरीर है, धन धन है, संबंध संबंध हैं; आत्मा उनसे भिन्न है। ( forum.jinswara.com)
- कषाय रोग है, और विवेकपूर्वक त्याग क्रोध नहीं
नोट्स में कषायों को रोग की तरह बताया गया है, और यह भी स्पष्ट किया गया है कि जब जीव विवेकपूर्वक किसी वस्तु का त्याग करके अपना उपयोग बदलता है, तो वह क्रोध रूपी भाव नहीं होता। यह प्रसंग मुझे इसलिए बहुत प्रेरक लगता है क्योंकि इसमें त्याग और द्वेष का भेद सिखाया गया है। कई बार हम सोचते हैं कि छोड़ देना ही कष्ट है, पर जैन दृष्टि कहती है कि यदि छोड़ना विवेक से हो तो वह शुद्ध परिणाम है, कषाय नहीं। यही भेद-विज्ञान है—भाव और वस्तु, त्याग और क्रोध, दोनों को अलग-अलग समझना। ( mmpclass.blogspot.com)