Hamen astonica parv kaise manana chahie vah ine Dinon mein hamare kartavya kya hai . Yah kis kis Granth mein aaya Hai
उत्तर
अष्टान्हिका पर्व जैन धर्म का अत्यन्त पवित्र पर्व है। यह सामान्यतः कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक, वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। Jainpedia इसे प्रमुख जैन पर्वों में गिनता है। ( jainpedia.org)कैसे मनाएँ / हमारे कर्तव्य
इन दिनों का मुख्य भाव बाह्य उत्सव से अधिक आत्मशुद्धि है। यथाशक्ति उपवास, एकासन या आयंबिल करना; सामायिक, प्रोषधोपवास, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, जप, ध्यान, ब्रह्मचर्य और दान-सेवा करना श्रेयस्कर माना गया है। जैन ग्रंथों में अष्टान्हिका-व्रत के साथ पूजा, स्वाध्याय और जप का विशेष उल्लेख मिलता है। ( jainqq.org)इन दिनों में पाँचों पापों से बचना, क्रोध-मान-माया-लोभ को कम करना, जिनदर्शन और जिनपूजन करना, तथा मन-वचन-काय को अधिक संयमित रखना चाहिए। जैन परंपरा में अष्टान्हिका-पूजा नंदीश्वर-द्वीप में देवों द्वारा होने वाली जिन-आराधना का प्रतीक-रूप मानी जाती है; मनुष्यों के लिए मंदिरों में की गई पूजा उसी आराधना का प्रतिरूप है। ( jainpedia.org)
यह किन ग्रंथों में मिलता है
उपलब्ध और सत्यापित स्रोतों के अनुसार अष्टान्हिका की पृष्ठभूमि विशेष रूप से नंदीश्वर-द्वीप की जैन ब्रह्माण्ड-विद्या से जुड़ी है। तत्त्वार्थसूत्र में नंदीश्वर-द्वीप का उल्लेख मिलता है, और Jainpedia के अनुसार नंदीश्वर-द्वीप तथा “eternal icons” की अवधारणा अनेक श्वेताम्बर ग्रंथों में वर्णित है। Jambūdvīpa-prajñapti भी श्वेताम्बर canon का भाग है और जैन ब्रह्माण्ड-वर्णन को समझने में सहायक है। ( jainqq.org)अष्टान्हिका-परंपरा से जुड़े जिन ग्रंथ-शीर्षकों का सत्यापन मिला, उनमें अष्टान्हिका-व्रतकथा, श्री अष्टान्हिका नंदीश्वर व्रत कथा, अष्टान्हिका महोत्सव, अष्टाह्निकापर्व व्याख्यान कथा, और नंदीश्वरद्वीप पूजा/विधान साहित्य शामिल हैं। ये अधिकतर बाद की व्रत-कथा और पूजा-साहित्य परंपरा के ग्रंथ हैं। ( jainqq.org)