Adhar papasthnak nivaran tap
उत्तर
अगर आप
“अठार पापस्थानक निवारण तप” की बात कर रहे हैं, तो यह जैन परंपरा में
18 पापस्थानकों का स्मरण करके उनसे
मन, वचन और काया से दूर रहने की साधना है। इसमें अपने हुए दोषों के लिए
“मिच्छामि दुक्कडं” कहकर प्रायश्चित्त भी किया जाता है। (
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व्याख्या
जैन ग्रंथों में जिन 18 पापस्थानकों का उल्लेख है, वे हैं:
जीवहिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्मचर्य, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्याख्यान, पैशुन्य, परपरिवाद, रति-अरति, मायामोसा, और मिथ्यादर्शन-शल्य। इसी संदर्भ में इन दोषों से
तीन करण और तीन योग से परिहार करने की बात कही गई है। (
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आध्यात्मिक अर्थ
इस तप का उद्देश्य केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि
आंतरिक शुद्धि है। जैन दृष्टि में यह साधना जीव को पापप्रवृत्तियों से सावधान करती है और आत्म-नियंत्रण, क्षमा तथा शुद्ध आचरण को मजबूत करती है। (
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Takeaway
संक्षेप में, यह
18 पापों का त्याग, उनसे निवृत्ति, और उनके लिए प्रायश्चित्त करने वाला जैन तप है। (
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