Chouthe anuvrat me to kaya se dusre manushya ke sath maithun ka tyag hota hai swyam ke dwara hastmaithun ka tyag nahi bataya to kya hastmaithun se dosh lagta hai
Answer
हाँ, जैन दृष्टि से हस्तमैथुन को भी दोषपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह काम-वासना, इंद्रिय-लोलुपता और आत्म-संयम के विरुद्ध है। चौथे अणुव्रत में शब्दों में मुख्यतः पर-स्त्री/पर-पुरुष से मैथुन-त्याग का उल्लेख आता है, लेकिन उसका भाव केवल बाहरी संबंधों तक सीमित नहीं है। जैन आचार की दृष्टि से विषय-भोग की ओर जाने वाला कोई भी आचरण आत्मशुद्धि के मार्ग में बाधक माना जाता है।Explanation
- चतुर्थ अणुव्रत गृहस्थ के लिए ब्रह्मचर्य का सीमित व्रत है।
- इसका मूल भाव है: अनियंत्रित काम-भोग से बचना।
- इसलिए यदि कोई व्यक्ति अकेले में भी काम-भावना को जानबूझकर उत्तेजित करता है, तो जैन दृष्टि से यह दोष माना जाएगा।
- हालांकि, अलग-अलग परंपराओं और आचार्यों की व्याख्या में इसको शब्दशः कैसे वर्गीकृत किया जाए, इसमें सूक्ष्म भेद हो सकते हैं। लेकिन आत्मिक शुद्धि के दृष्टिकोण से यह वांछनीय नहीं है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में लक्ष्य केवल बाहरी नियम निभाना नहीं, बल्कि अंदर की वासनाओं को भी कम करना है। हस्तमैथुन:- राग को बढ़ाता है
- मन को विषयों में बाँधता है
- वीर्य-शक्ति और संयम को कमजोर करता है
- कर्म-बंधन को बढ़ाने वाला माना जाता है
इसलिए साधक के लिए यह त्याज्य आचरण है, विशेषकर जब लक्ष्य ब्रह्मचर्य, तप और आत्म-नियंत्रण हो।