Indra ko nighod ka Swaroop kisne kaha
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जैन धर्म के अनुसार, आचार्य कुंदकुंद (Acharya Kundkund) ने "इन्द्र" को "निगोध का स्वरूप" कहा है। उनके अनुसार, इन्द्र (देवता) भी कर्मों के बंधन में बंधे हुए जीव हैं, और उनका सुख भी अस्थायी है। निगोध वह अवस्था है जिसमें जीव अत्यंत सूक्ष्म और न्यूनतम जीवन के साथ रहते हैं, और पुनः पुनः संसार में जन्म-मरण का चक्र भोगते हैं। आचार्य कुंदकुंद ने यह समझाया कि देव, इन्द्र आदि भी संसार के चक्र से मुक्त नहीं हैं और उनका स्वरूप भी निगोध की तरह ही परतंत्र है।
संदर्भ:
- समयसार (Acharya Kundkund)
- जैन आगम एवं टीकाएँ
इसलिए, आचार्य कुंदकुंद ने "इन्द्र" को "निगोध का स्वरूप" कहा है।