रात्री भोजन करने मास खाने के बराबर है किस शास्त्र में कहाँ है
रात्री भोजन के विषय में जैन आगमों में विशेष रूप से मना किया गया है। जैन धर्म के अनुसार, सूर्यास्त के बाद भोजन करना पाप के बराबर माना गया है, क्योंकि इस समय सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है और अंधकार में भोजन करने से अनजाने में अनेक जीवों की हिंसा हो जाती है।
"रात्री भोजन करने मास खाने के बराबर है"—इसका उल्लेख जैन आगम ग्रंथों एवं शास्त्रों में मिलता है। विशेषकर, यह बात "भगवती सूत्र", "दशवैकालिक सूत्र" तथा "योगशास्त्र" आदि ग्रंथों में परोक्ष रूप में कही गई है।
दशवैकालिक सूत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है: > "रैइभत्तं महापावं" > अर्थात्, रात्रि का भोजन महापाप है।
इसी प्रकार, योगशास्त्र (आचार्य हेमचंद्र) में कहा गया है: > "रात्रौ भुक्तं महापातकं।"
हालाँकि, "मास खाने के बराबर है"—इस प्रकार की उपमा मुख्यतः जैन acharayas द्वारा प्रवचन में दी जाती है ताकि लोग इस नियम का पालन करें। इसका आशय यह है कि रात्री भोजन करने से जितना पाप लगता है, वह मास (माँस/मांस) खाने जितना भारी पाप है।
संक्षेप में: शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि रात्रि भोजन महापाप है, और आचार्यों ने प्रवचनों में इसकी तुलना मास (मांस) खाने के पाप से की है। विशेष उल्लेख:
- दशवैकालिक सूत्र (अध्याय-6)
- भगवती सूत्र
- योगशास्त्र
संदर्भ:
- "रैइभत्तं महापावं" — दशवैकालिक सूत्र
- "रात्रौ भुक्तं महापातकं" — योगशास्त्र
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