रात को पानी पिना खून के बराबर किस शास्त्र मै कहा है
रात को पानी पीना "खून के बराबर है" — ऐसी कहावत या वचन जैन शास्त्रों में इस प्रकार नहीं मिलता कि 'खून के बराबर' शब्दशः लिखा हो। परंतु, जैन धर्म में रात्रि में जल ग्रहण (पानी पीना) वर्जित बताया गया है, विशेषकर श्रावक एवं साधु-साध्वियों के लिए।
जैन आगमों में कारण: रात्रि में जल ग्रहण करने से उसमें सूक्ष्म जीवों की वृद्धि हो जाती है, जिससे हिंसा का दोष लगता है। इसलिए अहिंसा के सिद्धांत के अनुसार, रात में जल ग्रहण करना वर्जित है।
प्रमुख ग्रंथ:
- 'श्रावकाचार' (आचारांग सूत्र, उपासक दशा अंग आदि) में रात्रि भोजन एवं जल ग्रहण का निषेध विस्तार से बताया गया है।
- 'श्री कल्पसूत्र' और 'दशवैकालिक सूत्र' आदि में भी रात्रि में किसी भी प्रकार का आहार-जल ग्रहण निषिद्ध है।
लोकवाणी: "रात को पानी पीना खून के बराबर है" — यह कहावत जैन परंपरा में अहिंसा के महत्व को समझाने के लिए प्रचलित है, लेकिन ये शब्द शास्त्रों में यथावत नहीं लिखे हैं। यह उपमा दी जाती है कि जितनी हानि हिंसा से होती है, उतनी ही हानि रात्रि में जल ग्रहण से सूक्ष्म जीवों की हिंसा द्वारा होती है।
निष्कर्ष: रात्रि में जल ग्रहण के विषय में जैन शास्त्रों में स्पष्ट निषेध है, लेकिन "खून के बराबर" जैसा शब्दश: वचन शास्त्रों में नहीं मिलता, यह एक लोक-उक्ति है जो जैनाचार्यों और समाज द्वारा बताई जाती है अहिंसा की महत्ता को समझाने के लिए।
यदि आपको किसी विशेष शास्त्र का संदर्भ चाहिए, तो 'आचारांग सूत्र', 'दशवैकालिक सूत्र', या 'श्रावकाचार' का अध्ययन कर सकते हैं, जिसमें रात्रि में जल ग्रहण के दोष विस्तार से बताए गए हैं।