Namorhata siddhhacharya upaadhyay sarva saadubhya ya sutra sirf purush hi kyu bolte he
Answer
यह केवल पुरुषों के लिए नहीं कहा जाता। “सर्व साधुभ्यः” या “नमो लोए सव्वसाहूणं” जैसे पदों में साधु शब्द का प्रयोग कई बार व्याकरणिक रूप से सामान्य/पुल्लिंग रूप में होता है, लेकिन उसका अर्थ सभी साधु-साध्वी पर लागू होता है।Explanation
जैन परंपरा में:- साधु = मुनि
- साध्वी / आर्यिका = मुनि-जीवन अपनाने वाली स्त्री
प्राकृत और संस्कृत में कई बार पुल्लिंग बहुवचन शब्द का उपयोग सामान्य समूह के लिए किया जाता है। इसलिए “सर्व साधुभ्यः” का भाव यह नहीं है कि सिर्फ पुरुष ही वंदनीय हैं, बल्कि यह है कि:
- सभी संयमी आत्माएँ
- सभी मुनि
- सभी साध्वी
- सभी त्यागी, विरक्त, साधना-रत महात्मा
सबके लिए नमस्कार किया जा रहा है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में आत्मा का स्वरूप लिंग से नहीं, बल्कि गुणों से पहचाना जाता है। इसलिए वंदना देह को नहीं, बल्कि:- संयम
- त्याग
- तप
- ज्ञान
- सम्यक आचरण
को की जाती है।
नमस्कार का भाव यह है कि जो भी मोक्षमार्ग पर हैं, उन सबको श्रद्धा से प्रणाम।