ज्वाला से ज्योति किसने पाई
Answer
यदि आपका आशय जैन भाव “ज्योति से ज्योति” से है, तो इसका उत्तर है: साधक/आत्मा ने। जैन परंपरा में यह भाव माना गया है कि एक जागृत आत्मा की ज्योति, दूसरी आत्मा में जागरण पैदा करती है। ( jainqq.org)Explanation
जैन ग्रंथों में यह भाव मिलता है कि ज्योति से ज्योति जगती है; यानी ज्ञान, श्रद्धा और शुद्ध आचरण का प्रकाश एक व्यक्ति से दूसरे में संचारित होता है। अरहंत-सिद्ध की उपासना और जिनदर्शन-पूजन से उपासक स्वयं भी ज्योतिर्मय बनने की दिशा में बढ़ता है। ( jainqq.org)Spiritual Understanding
जैन दृष्टि में बाहर की ज्वाला नहीं, बल्कि अंदर की ज्ञान-ज्योति महत्वपूर्ण है। जब आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानती है, तब वह अंधकार से प्रकाश की ओर जाती है। ( jainqq.org)Takeaway
संक्षेप में: ज्योति आत्मा ने पाई — गुरु, जिनदर्शन और आत्मबोध के सहारे। ( jainqq.org)यदि आप चाहें, तो मैं इसी पंक्ति का सरल जैन अर्थ भी बता सकता हूँ।