जैन परंपरा में भगवान पार्श्वनाथ के किसी एक विशेष महामुनि को “नपुंसक” के रूप में प्रामाणिक तौर पर नहीं बताया गया है। “नपुंसक वेद” जैन दर्शन में एक कर्म/भाव की श्रेणी है, किसी मुनि की पहचान नहीं। पार्श्वनाथ-चरित में यह प्रसंग उनके साधना-क्रम के संदर्भ में आता है कि उन्होंने नौवें गुणस्थान में नपुंसक वेद का क्षय किया। ( jainqq.org)
स्पष्टीकरण
भगवान पार्श्वनाथ के मुख्य गणधर/शिष्य-परंपरा के बारे में ग्रंथों में अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं, और उनके पूर्ण परिचय को कुछ ग्रंथ “कठिनसाध्य” भी बताते हैं। उपलब्ध परंपरागत स्रोतों में किसी भी विशेष गणधर या महामुनि को “नपुंसक” कहकर अलग से नामित नहीं किया गया है। इसलिए यदि आपका आशय किसी खास नाम से है, तो वह प्रामाणिक रूप से स्पष्ट नहीं मिलता। ( jainqq.org)
आध्यात्मिक अर्थ
जैन दृष्टि में साधना का लक्ष्य शरीर की पहचान नहीं, बल्कि कषायों और कर्मों का क्षय है। इसलिए “नपुंसक वेद” का उल्लेख भी आत्म-शुद्धि और कर्म-क्षय की प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए, न कि किसी साधु के प्रति लेबल के रूप में। ( jainqq.org)
सार
संक्षेप में: पार्श्वनाथ के किसी खास महामुनि को नपुंसक बताने का प्रामाणिक, सर्वमान्य उल्लेख नहीं मिलता। जो उल्लेख मिलता है, वह नपुंसक वेद के कर्म-क्षय का है। ( jainqq.org)