Vandittu sutra 28 gaatha hindi meaning
Answer
वंदित्तु सूत्र की 28वीं गाथा का हिंदी भावार्थ यह है:
“आनवणे, पेसवणे, सद्दे, रूवे, अ पुग्गलक्खेवे, देसावगासिअम्मि, बीए सिक्खावए निंदे॥28॥”
अर्थ:
देशावकाशिक नामक दूसरे शिक्षाव्रत में जो पाँच अतिचार लगते हैं—बाहर से वस्तु मंगवाना, बाहर वस्तु भेजना, आवाज़ देकर बुलाना, संकेत/रूप दिखाकर बुलाना, और वस्तु फेंककर अपनी उपस्थिति बताना—उनकी मैं निंदा/आलोचना करता हूँ। (
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Explanation
इस गाथा में श्रावक अपने
देशावकाशिक व्रत की शुद्धि करता है। इसका भाव है कि व्रत के पालन में यदि जाने-अनजाने कोई दोष लगा हो, तो साधक उसके लिए आत्म-आलोचना करके शुद्धि करता है। यह गाथा विशेष रूप से
पाँच अतिचारों की याद दिलाती है। (
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Spiritual Understanding
जैन धर्म में व्रत केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि
अंतर की सावधानी और शुद्धि का साधन है। इस गाथा से सीख मिलती है कि साधक को अपने आचरण, बोलचाल और संकेतों तक में संयम रखना चाहिए, ताकि व्रत की मर्यादा बनी रहे। (
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Takeaway
28वीं गाथा का सार है:
व्रत की मर्यादा टूटे तो तुरंत आत्म-निंदा, पश्चाताप और शुद्धि करनी चाहिए। (
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