राजीभोजन करन मास तुलय है
आपका प्रश्न "राजीभोजन करन मास तुलय है" से संबंधित है। जैन धर्म में "राजीभोजन" का अर्थ है स्वादिष्ट, विविध, और अत्यधिक आकर्षक भोजन, जैसा कि राजाओं को परोसा जाता है। जैन आचार्य और साधु-साध्वियाँ राजीभोजन का त्याग करते हैं और अत्यंत सादा, संयमित आहार ग्रहण करते हैं।
जैन आगमों में बताया गया है कि यदि कोई साधु या साध्वी राजीभोजन ग्रहण करता है, तो उसका तप, त्याग और साधना कम हो जाती है। जैन धर्म में संयम, साधुता, और अहिंसा के लिए सादा भोजन (अल्प और सात्विक भोजन) को श्रेष्ठ माना गया है।
"मास तुल्य" का अर्थ है "मास के समान"। जैन धर्म में मांसाहार (मासाहारी भोजन) का पूर्ण रूप से निषेध है क्योंकि उसमें प्रत्यक्ष हिंसा है। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक स्वादिष्ट और भोगी भोजन करता है, तो वह भी आत्मिक प्रगति के लिए बाधक है और कुछ अर्थों में मास के समान ही त्याज्य माना गया है।
इसलिए, जैन दृष्टिकोन से — राजीभोजन भी आत्मिक साधना में बाधक है और उसे भी त्यागना चाहिए, जैसे मांसाहार का त्याग किया जाता है।
यह विचार जैन धर्म के तप, संयम और अहिंसा के सिद्धांतों से जुड़ा है।