जैन धर्म की सामान्य और सर्वमान्य परंपरा में “नैत्रय” नाम का कोई प्रसिद्ध गोत्र मुझे सत्यापित रूप से नहीं मिला। जैन दर्शन में गोत्र-कर्म के मुख्यतः दो भेद बताए जाते हैं—उच्च गोत्र और नीच गोत्र। कुछ आगमिक/परंपरागत सूचियों में काश्यप, कौशिक, दार्भायन, चामरछाय, शुंगायन जैसे गोत्र-नाम मिलते हैं, लेकिन “नैत्रय” उन मानक सूचियों में नहीं दिखता। ( jainqq.org)
Explanation
इसलिए संभव है कि नाम की वर्तनी अलग हो, या यह किसी विशेष स्थानीय/कुल-परंपरा का नाम हो। जैन सिद्धांत के स्तर पर, गोत्र का मुख्य अर्थ उच्च-नीच स्थिति से जुड़ा होता है, न कि केवल किसी एक पारिवारिक उपनाम से। ( jainqq.org)
Spiritual Understanding
जैन धर्म में गोत्र का मूल्यांकन बाहरी पहचान से अधिक कर्म और आचरण के संदर्भ में किया जाता है। इसलिए गोत्र-नाम से अधिक महत्वपूर्ण है सम्यक् आचरण, विनय, और अहिंसा। ( jainqq.org)
Takeaway
संक्षेप में: “नैत्रय” जैन धर्म का सर्वमान्य गोत्र नहीं प्रतीत होता। जैन परंपरा में गोत्र-कर्म का मूल सिद्धांत उच्च और नीच गोत्र से जुड़ा है। ( jainqq.org)