Vandittu sutra ki 28th gatha ko examples ke through samjhaye easy
Answer
वंदित्तु सूत्र की 28वीं गाथा का सरल भाव यह है: दूसरे शिक्षाव्रत (देशावकाशिक) में होने वाली गलतियों से मैं पीछे हटता हूँ — यानी अगर मैं किसी काम को आदेश देकर, किसी को भेजकर, आवाज़ से, इशारे से, या वस्तु फेंककर करवाता हूँ, तो वह भी दोष है। ( bahubaleshwar.com)इस गाथा की पंक्ति है: “आणवणे पेसवणे, सद्दे रूवे अ पुग्गल-क्खेवे. देसावगासियम्मि, बीए सिक्खा-वए निंदे.” ( bahubaleshwar.com)
Explanation
यहाँ बात देशावकाशिक शिक्षाव्रत की है। इसका मतलब है अपनी गतिविधियों, आने-जाने और कामों की सीमा तय करना।अब गाथा के शब्दों को आसान भाषा में समझिए:
- आणवणे = आदेश देना
- पेसवणे = किसी को भेजना
- सद्दे = आवाज़ देकर बुलाना
- रूवे अ पुग्गल-क्खेवे = इशारे से या किसी वस्तु के माध्यम से संकेत देना
आसान उदाहरण
मान लीजिए आपने तय किया कि आज आप एक सीमित क्षेत्र में ही रहेंगे।फिर:
- आपने खुद नहीं जाना, लेकिन किसी और को बोल दिया: “जाओ, मेरे लिए वहाँ से सामान ले आओ।”
- आपने किसी को भेज दिया कि वह आपके लिए बाहर का काम करे।
- आपने दूर से चिल्लाकर बुलाया या आवाज़ दी कि वह काम कर दे।
- आपने हाथ से इशारा किया या कोई चीज़ फेंककर संकेत दिया कि वह काम हो जाए।
गाथा का सार
यह गाथा सिखाती है कि सिर्फ सीधे उल्लंघन ही नहीं, बल्कि परोक्ष तरीके से नियम तोड़ना भी दोष है। जैन दृष्टि में व्रत की पवित्रता बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए मन, वाणी और व्यवहार — तीनों में सावधानी रखनी चाहिए।Spiritual Understanding
इस गाथा का आध्यात्मिक संदेश है:- व्रत को केवल दिखावे के लिए नहीं, सच्चे भाव से निभाना चाहिए।
- नियम की सीमा केवल शरीर से नहीं, मन और वाणी से भी माननी चाहिए।
- छोटी-सी लापरवाही भी संयम को कमजोर कर सकती है।