Shravk ka varsik kartavya
जैन धर्म में "श्रावक" (गृहस्थ अनुयायी) के लिए वार्षिक कर्तव्य (varsik kartavya) विशेष रूप से उल्लेखित हैं। श्रावकों के ये कर्तव्य आत्मशुद्धि, संयम, और धर्म की प्रगति के लिए निर्धारित किए गए हैं। वार्षिक कर्तव्यों में मुख्य रूप से निम्नलिखित सम्मिलित हैं:
- पक्षालिका (Paryushan पर्व का पालन):
प्रत्येक वर्ष श्रावकों का मुख्य कर्तव्य है कि वे पर्युषण पर्व में भाग लें। पर्युषण के दौरान अष्टाह्निका, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, तपस्या, क्षमापना (मिच्छामी दुक्कड़ं) आदि करना चाहिए।
- प्रतिसंवत्सरी प्रतिक्रमण:
यह प्रतिक्रमण वर्ष में एक बार, पर्युषण पर्व के अंतिम दिन किया जाता है। इसमें जीवन में अनजाने में हुए पापों की क्षमा माँगी जाती है।
- अतिथि-पूजा व साधु-संतों की सेवा:
वर्ष में कम से कम एक बार साधु-संतों का सन्मान, उनकी सेवा, और उनकी वाणी का श्रवण करना चाहिए।
- दान और धर्म-कृत्य:
वार्षिक रूप से श्रावकों को जरूरतमंदों को दान देना, जिनेंद्र भगवान के मंदिरों में पूजन, अभिषेक आदि करना चाहिए।
- संयम का पालन:
साल में कम से कम एक बार उपवास (अल्पाहार या निर्जल उपवास), सामायिक, नवकारसी आदि संयम साधना करनी चाहिए।
- धर्म ग्रंथों का अध्ययन:
वार्षिक रूप से जैन धर्म ग्रंथों का अध्ययन और स्वाध्याय करना चाहिए।
- पंचकल्याणक, मंदिर प्रतिष्ठा, आदि धार्मिक आयोजनों में भागीदारी:
वर्ष में होने वाले धार्मिक आयोजनों में श्रावक को भाग लेना चाहिए।
सारांश: श्रावक का वार्षिक कर्तव्य है कि वह पर्युषण पर्व में अवश्य भाग ले, प्रतिसंवत्सरी प्रतिक्रमण करे, दान-धर्म में रुचि रखे, संयम साधना करे, साधु-संतों की सेवा व सत्संग करे, और धर्मग्रंथों का अध्ययन करे।
ये कर्तव्य श्रावक के आत्मकल्याण व समाज में धर्म की वृद्धि हेतु अत्यंत आवश्यक माने गए हैं।