मतलब दिगंबर जैन तेरापंथ धर्म के गृंथों में प्रमाणिक बात को ही स्वीकार किया जाता है क्या ऐसा किस गृंथों में लिखा है तथा अप्रमाणिक बात को स्वीकार क्यों नहीं किया जाता
Answer
हाँ, जैन परंपरा में — विशेषकर दिगंबर मार्ग में — प्रमाणिक, शास्त्र-संगत और युक्ति-संगत बात ही स्वीकार की जाती है। जो बात आगम, आचार्य-परंपरा, तर्क और सम्यक् ज्ञान के विरुद्ध हो, उसे अंतिम सत्य मानकर स्वीकार नहीं किया जाता।Explanation
जैन दर्शन में ज्ञान को बहुत महत्त्व दिया गया है। सिर्फ सुन लेने, अनुमान लगा लेने, या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के कह देने से कोई बात प्रमाणिक नहीं हो जाती।जैन दृष्टि से कोई बात तब स्वीकार्य मानी जाती है जब वह:
- शास्त्र-सम्मत हो
- तर्कसंगत हो
- अनुभव और सिद्धांत से मेल खाती हो
- एकांगी न होकर अनेकांत के अनुरूप हो
दिगंबर परंपरा में इस विचार की जड़ें मुख्य रूप से इन ग्रंथ-परंपराओं में मिलती हैं:
- तत्त्वार्थसूत्र
- समयसार
- पंचास्तिकायसार
- षट्खंडागम
- धवला, जयधवला, महाधवला
- तथा अनेक आचार्य-टीकाएँ और भाष्य
इन ग्रंथों में ज्ञान, सम्यक् दृष्टि, और प्रमाण-नय की महत्ता बार-बार बताई गई है। अर्थात् कोई भी बात बिना आधार के मान लेना जैन दृष्टि नहीं है।
Spiritual Understanding
अप्रमाणिक बात इसलिए नहीं स्वीकार की जाती क्योंकि जैन धर्म का लक्ष्य केवल विश्वास नहीं, बल्कि यथार्थ ज्ञान है।अप्रमाणिक बातों से:
- भ्रम पैदा होता है
- मिथ्या दृष्टि बढ़ती है
- आचार में दोष आ सकता है
- आत्मकल्याण की दिशा कमजोर पड़ती है
जैन धर्म में सम्यक् ज्ञान मोक्ष-मार्ग का एक प्रमुख अंग है। इसलिए जो बात सत्य, प्रमाण और शास्त्र के अनुकूल नहीं है, उसे स्वीकार करना उचित नहीं माना जाता।
Takeaway
संक्षेप में: जैन धर्म में प्रमाणिक बात ही स्वीकार की जाती है, क्योंकि मोक्ष-मार्ग सम्यक् ज्ञान पर आधारित है। अप्रमाणिक बात को स्वीकार न करने का कारण यही है कि वह सत्य, शास्त्र और आत्महित के मार्ग से भटका सकती है।यदि आप चाहें, तो मैं इसी विषय पर “प्रमाण, नय, और अनेकांत” को बहुत सरल भाषा में अलग से समझा सकता हूँ।