अच्छा दिगंबर जैन शुद्ध तेरापंथ धर्म के अनुसार व्यंतर देवों को मतलब मिथ्या दृष्टि व्यंतर देवों को जिन मंदिर तोड़ने के भाव आ सकते हैं क्या तथा प्रथमानियोग में ऐसी कोई कथा आती है क्या कि व्यंतर ों ने जिन मंदिर तोड़ा हो
उत्तर
हाँ, जैन परम्परा में कुछ व्यंतर देवों के बारे में यह वर्णन मिलता है कि वे पूर्व-वैर, खेल-स्वभाव या उपद्रव-प्रवृत्ति के कारण मनुष्यों को भय, बाधा या कष्ट दे सकते हैं। Tattvartha-सूत्र पर आधारित जैन विवरणों में व्यंतरों के आठ उपभेद बताए गए हैं, और कुछ ग्रन्थ यह भी कहते हैं कि वे पुराने संबंधों के कारण मनुष्यों की सेवा भी कर सकते हैं या शत्रुता के कारण भय उत्पन्न कर सकते हैं। लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि हर व्यंतर का स्वभाव ही जिन-मंदिर तोड़ना है। (
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Explanation
जैन ग्रन्थों में व्यंतर देवों की शक्ति सीमित बताई गई है। कुछ स्थानों पर यह भी कहा गया है कि अदृश्य/काल्पनिक देवों के नाम से जो चमत्कार बताए जाते हैं, वे कई बार व्यंतर-देवों की क्रीड़ा या उनकी ओर से उत्पन्न प्रभाव होते हैं; पर वे सब-कुछ करने वाले नहीं हैं। “मोक्षमार्गप्रकाशक” में यह भाव आता है कि उनके द्वारा कुछ उपद्रव या चमत्कार-जैसी घटनाएँ दिखाई दे सकती हैं, फिर भी सुख-दुःख का मूल कारण जीव के अपने पुण्य-पाप कर्म ही हैं। (
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Prathamanuyoga के बारे में
यदि आपका अभिप्राय “प्रथमानुयोग” से है, तो वह जैन साहित्य का वह भाग है जिसमें चरित, पुराण और महान पुरुषों की कथाएँ आती हैं। उपलब्ध जैन स्रोतों में मुझे जो प्रसिद्ध कथा मिली, वह आबू के विमल-वसही मंदिर से जुड़ी है: वहाँ निर्माण के समय “वाली-नाहा” नामक एक व्यंतर रात में बना हुआ काम तोड़ देता था, और इस प्रसंग का उल्लेख “Vimala-prabandha and such other texts” के आधार पर किया गया है। इसलिए यह कथा प्रायः प्रबंध-परम्परा की कथा मानी जाती है; इसे मैं प्रथमानुयोग की standard कथा के रूप में नहीं रखूँगा। (
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Takeaway
संक्षेप में: हाँ, कुछ व्यंतरों में उपद्रव या विरोधी भाव का वर्णन मिलता है, इसलिए मंदिर-निर्माण में बाधा की कथा जैन परम्परा में मिलती है; लेकिन उसे सभी व्यंतरों का स्वभाव नहीं कहना चाहिए। और जिस प्रसिद्ध कथा का उल्लेख मिलता है, वह आबू-विमल वसही वाली प्रबंध-कथा है। (
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