जैन शास्त्रों के अनुसार, अत्यन्त ईर्ष्या स्त्रीवेद / स्त्रीभाव के आस्रव का कारण मानी गई है। इसलिए “ईर्ष्या से स्त्रीभाव” का सामान्य शास्त्रीय उत्तर यही है। किसी एक निश्चित व्यक्ति का नाम इस सिद्धान्त में सामान्य रूप से नहीं दिया गया है। ( jainqq.org)
Explanation
कर्म-विपाक ग्रंथों में स्त्रीवेद के आस्रव के कारणों में “अत्यन्त ईर्ष्या” का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसका अर्थ है कि ईर्ष्या जैसे परिणाम भविष्य में स्त्रीवेद के बन्ध का कारण बन सकते हैं। ( jainqq.org)
Spiritual Understanding
जैन दृष्टि में ईर्ष्या मन को अशान्त करती है और कर्म-बंधन बढ़ाती है। इसलिए संतोष, समता और आत्म-शुद्धि को बहुत महत्त्व दिया गया है। ( jainqq.org)
Takeaway
संक्षेप में: ईर्ष्या से स्त्रीवेद/स्त्रीभाव का आस्रव होता है। ( jainqq.org)