वे तीर्थंकर जो तीन पद के धारी है और क्यों
Answer
यदि आपका आशय “त्रिपदी” से है, तो जैन परंपरा में यह विशेष रूप से भगवान महावीर स्वामी से जुड़ी है। उन्होंने अपने प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम और अन्य गणधरों को उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य की त्रिपदी का उपदेश दिया, जिसे जैन दर्शन की मूल आधार-व्याख्या माना जाता है. ( jainbelief.com)Explanation
इस त्रिपदी का अर्थ है:- उत्पाद — नया रूप उत्पन्न होना
- व्यय — पुराना रूप नष्ट होना
- ध्रौव्य — मूल गुणों का स्थिर रहना. ( jainbelief.com)
इसी कारण “तीन पद” के संदर्भ में भगवान महावीर का ही सबसे अधिक उल्लेख आता है, क्योंकि यही उपदेश जैन दर्शन की कुंजी माना गया है. ( jainbelief.com)
अगर आपका मतलब “चक्रवर्ती-तीर्थंकर” था, तो वे शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ हैं, क्योंकि जैन परंपरा के अनुसार ये तीनों तीर्थंकर होने के साथ चक्रवर्ती भी थे. ( encyclopediaofjainism.com)
Spiritual Understanding
त्रिपदी हमें यह समझाती है कि संसार में परिवर्तन होता रहता है, पर आत्मा के शुद्ध गुण और सत्य-स्वरूप का आधार बना रहता है। यही जैन दृष्टि का गहरा दर्शन है. ( jainbelief.com)Takeaway
संक्षेप में:- त्रिपदी से संबंध मुख्यतः भगवान महावीर का है. ( jainbelief.com)
- चक्रवर्ती-तीर्थंकर तीन हैं: शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ. ( encyclopediaofjainism.com)