कानून और न्याय व्यवस्था इस अपराध की रोकथाम के लिए और अपराधी को सजा देने के लिए मुस्तैदी से कार्यरत है। परन्तु यह बेअसर सिद्ध हो रही है ,क्योंकि मृत्युदण्ड की सजा के उपरांत भी ,यौन अपराधी बेजिझक दुष्कर्मों के अंजाम देने से बाज नहीं आ रहे है। पीड़िता के पुन
Answer
हाँ, जैन दृष्टि से महावीर-प्रणीत ब्रह्मचर्य यौन-अपराधों की जड़ पर प्रहार करने वाली एक बहुत बड़ी औषधि हो सकती है। लेकिन इसे केवल “यौन संयम” तक सीमित नहीं समझना चाहिए। जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का अर्थ है:- इंद्रियों पर संयम
- वासना पर नियंत्रण
- मन की शुद्धि
- दूसरों के शरीर, सम्मान और गरिमा का पूर्ण आदर
इसलिए, यदि समाज में ब्रह्मचर्य-भावना, आत्मसंयम, और अहिंसक दृष्टि मजबूत हो, तो अपराध की प्रवृत्ति पर गहरा अंकुश लग सकता है।
Explanation
जैन धर्म के अनुसार अपराध केवल बाहरी व्यवहार नहीं है, उसकी जड़ भीतर के विकारों में होती है। यौन-उत्पीड़न जैसी हिंसा के पीछे प्रायः ये कारण होते हैं:- काम-वासना की अनियंत्रित वृद्धि
- कषायों का प्रबल होना
- इंद्रिय-लोलुपता
- दूसरे को वस्तु समझने की प्रवृत्ति
- आत्मसंयम का अभाव
महावीर का ब्रह्मचर्य केवल साधुओं के लिए नियम नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक जीवन-शिक्षा है। यह मनुष्य को सिखाता है कि:
- इच्छा और आवश्यकता में अंतर समझे
- भोग की सीमा पहचानें
- दूसरे के शरीर को सम्मान दें
- किसी को भी अपनी तृष्णा का साधन न बनाए
इस अर्थ में ब्रह्मचर्य एक “निवारक चिकित्सा” है, जो अपराध बनने से पहले ही विकार को रोकने का प्रयास करती है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का स्थान बहुत ऊँचा है, क्योंकि यह आत्मा की शक्ति को बाहर की विक्षेपकारी प्रवृत्तियों से बचाता है। जब मन वासना के अधीन होता है, तब करुणा, विवेक और अहिंसा कमजोर पड़ते हैं। और जब मन संयमित होता है, तब व्यक्ति में ये गुण बढ़ते हैं:- संवेदनशीलता
- मर्यादा
- आत्म-नियंत्रण
- सम्मानभाव
- अहिंसा
यौन-हिंसा वास्तव में घोर हिंसा है, क्योंकि इसमें केवल शारीरिक नहीं, मानसिक और सामाजिक आघात भी होता है। इसलिए जैन दृष्टि से इसका मूल उपचार केवल दंड नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि है। महावीर की शिक्षा का सार यही है कि मनुष्य पहले अपने भीतर विजय प्राप्त करे, तभी वह बाहर किसी को आहत नहीं करेगा।