Akashayi sadhu ka nirtichar yatarth charitra
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Answer
जैन धर्म में अकषायी साधु का अर्थ है ऐसा साधु जिसमें कषायों का क्षय या बहुत ही सूक्ष्म रूप हो, यानी क्रोध, मान, माया, लोभ पर पूर्ण नियंत्रण हो। और निरतिचार चरित्र का अर्थ है व्रतों का बिना किसी दोष के, शुद्ध रूप से पालन करना।Explanation
साधु का यथार्थ चरित्र यह माना जाता है कि वह:- पाँच महाव्रतों का पालन करे
- पाँच समिति में सावधानी रखे
- तीन गुप्ति का पालन करे
- कषायों को कम से कम करे
- आत्मसंयम, अहिंसा, अपरिग्रह और अपरिग्रह-भाव में स्थित रहे
यदि साधु का आचरण:
- बिना प्रमाद के हो,
- बिना दोष के हो,
- और व्रतों में निरंतर सावधानी रहे,
तो उसे निरतिचार चरित्र कहा जाता है।
Spiritual Understanding
जैन साधु जीवन का लक्ष्य है आत्मा की शुद्धि। अकषाय और निरतिचार चरित्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:- इससे पुण्य-आस्रव कम होता है
- कर्मबंधन घटता है
- संयम बढ़ता है
- मोक्षमार्ग में दृढ़ता आती है
अर्थात, साधु का वास्तविक सौंदर्य उसके बाहरी वेश में नहीं, बल्कि अंत:करण की निर्मलता और आचरण की शुद्धता में होता है।