क्या लकड़ी अशुद्ध नहीं होती
जैन धर्म के अनुसार, "अशुद्ध" (impure) या "शुद्ध" (pure) का संबंध वस्तुओं की आत्मा, उपयोग और उसमें निवास करने वाले जीवों से होता है। लकड़ी को जैन शास्त्रों में निर्जीव (non-sentient) नहीं माना गया है; उसमें भी एकेन्द्रिय जीव (one-sensed beings) जैसे वनस्पति काय के जीव निवास करते हैं। इसलिए, लकड़ी में जीवन माना जाता है और उसे काटना, जलाना या अनावश्यक नुकसान पहुँचाना हिंसा के अंतर्गत आता है, विशेषकर श्रावक और मुनि के लिए।
जैन साधु-साध्वियाँ प्रायः लकड़ी का प्रयोग नहीं करते, और अगर करना भी हो तो अत्यंत सावधानी से करते हैं, जिससे कम से कम हिंसा हो। आम जीवन में भी जैन अनुयायी लकड़ी से बनी वस्तुओं का उपयोग आवश्यकता अनुसार सीमित रखते हैं और उसमें बसे जीवों का सम्मान करते हैं।
इस प्रकार, जैन दृष्टि से लकड़ी अपने आप में "अशुद्ध" नहीं है, किंतु उसमें जीवन है और उसका अनावश्यक उपयोग हिंसा की श्रेणी में आता है।