Vistar me nav Graveyak bataye
उत्तर
जैन धर्म में नव ग्रैवेयक ऊर्ध्वलोक के बहुत उच्च देव-लोक माने जाते हैं। ये 9 स्वर्गीय विमानों/लोकों का समूह है, जहाँ अत्यंत पुण्यवान जीव जन्म लेते हैं।विस्तार
ग्रैवेयक का अर्थ है ऐसे दिव्य लोक, जहाँ के देव बहुत सूक्ष्म, सुंदर और दीर्घायु होते हैं। ये 12 कल्पों से ऊपर और 5 अनुत्तर विमानों से नीचे माने जाते हैं।नव ग्रैवेयक की मुख्य बातें
- ये 9 स्तर होते हैं।
- हर अगला ग्रैवेयक पहले से अधिक श्रेष्ठ और सूक्ष्म होता है।
- यहाँ के देवों का जीवन:
- फिर भी ये मोक्ष नहीं हैं, क्योंकि मोक्ष केवल कर्म-क्षय से होता है।
नव ग्रैवेयक की सामान्य स्थिति
जैन cosmology में ऊर्ध्वलोक की रचना इस प्रकार समझी जाती है:- कल्पवासी देव
- ग्रैवेयक देव
- अनुत्तरवासी देव
अर्थात ग्रैवेयक एक मध्य-उच्च दिव्य श्रेणी है।
नव ग्रैवेयक के नाम
जैन ग्रंथ परंपरा में इनके 9 स्तर माने गए हैं, लेकिन अलग-अलग ग्रंथों/परंपराओं में उनके नामों का उल्लेख भिन्न रूप में मिलता है। इसलिए सुरक्षित रूप से इन्हें ऐसे ही समझना चाहिए:- प्रथम ग्रैवेयक
- द्वितीय ग्रैवेयक
- तृतीय ग्रैवेयक
- चतुर्थ ग्रैवेयक
- पंचम ग्रैवेयक
- षष्ठ ग्रैवेयक
- सप्तम ग्रैवेयक
- अष्टम ग्रैवेयक
- नवम ग्रैवेयक
इनके देव कैसे होते हैं?
- अत्यंत पुण्यवान
- दीर्घायु
- सूक्ष्म शरीरधारी
- भोग-सुख में स्थित
- सामान्य देवों की अपेक्षा अधिक ऊँचे स्तर के
आध्यात्मिक समझ
जैन दृष्टि से नव ग्रैवेयक यह बताते हैं कि पुण्य से ऊँचे स्वर्गीय सुख तो मिल सकते हैं, लेकिन मुक्ति नहीं। मुक्ति के लिए केवल:- सम्यक दर्शन
- सम्यक ज्ञान
- सम्यक चारित्र
- और कर्मों का पूर्ण क्षय
आवश्यक है।
इसलिए ग्रैवेयक हमें यह सिखाते हैं कि दिव्य सुख भी अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम लक्ष्य है मोक्ष।
सार
नव ग्रैवेयक जैन ब्रह्मांड के ऊर्ध्वलोक के 9 उच्च देव-लोक हैं। ये बहुत पुण्यवान जीवों के निवास स्थान हैं, लेकिन ये भी संसार के ही भाग हैं। इनका मुख्य संदेश है: सुख से ऊपर उठकर मोक्ष की साधना करना।यदि आप चाहें, तो मैं नव ग्रैवेयक का चित्रात्मक क्रम या ऊर्ध्वलोक की पूरी सूची भी सरल भाषा में बता सकता हूँ।