कमंडल में जो पानी है उसी को शौच जाते है और उसी के पानी से हाथ की शुद्ध करते है से
जैन धर्म में कमंडल का प्रयोग साधु-साध्वियाँ करते हैं। कमंडल एक छोटा पात्र होता है जिसमें वे सीमित मात्रा में जल रखते हैं। शौच आदि के समय शुद्धि के लिए उसी कमंडल के जल का प्रयोग किया जाता है। शौच के बाद उसी जल से वे अपने हाथों को भी शुद्ध करते हैं।
इसका कारण यह है कि जैन साधु-साध्वियाँ अपरिग्रह (ग्रहण न करना) के सिद्धांत का पालन करते हैं, अतः वे सीमित वस्तुएँ ही रखते हैं। कमंडल का जल शुद्ध एवं सीमित होता है, जिससे अनावश्यक जल का अपव्यय भी नहीं होता और अहिंसा का पालन भी होता है। वे नदी, नल आदि से बार-बार जल नहीं लेते, जिससे जलचर जीवों की हिंसा भी नहीं होती।
इस प्रकार, कमंडल का जल शौच के बाद हाथ धोने, मुँह धोने आदि के लिए प्रयुक्त होता है, और यही जैन साधु-साध्वियों की परंपरा है।