Paryupasana ke bhed
Answer
पर्युपासना का सामान्य अर्थ सेवा, भक्ति और आदरपूर्वक उपासना है। जैन परंपरा में इस शब्द की एक ही, सर्वमान्य “भेद-सूची” हर जगह नहीं मिलती; लेकिन व्यवहार में इसकी प्रमुख अभिव्यक्तियाँ देवपूजा, गुरु-उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान के रूप में बताई जाती हैं। ( jainqq.org)Explanation
यदि आप “पर्युपासना के भेद” से इसके व्यवहारिक रूप पूछ रहे हैं, तो इसे इस तरह समझ सकते हैं:- देवपूजा — जिनेन्द्र भगवान के प्रति श्रद्धा और आराधना। ( jainworld.com)
- गुरु-उपासना — आचार्य, उपाध्याय, साधु-साध्वी के प्रति विनय और सेवा। ( jainworld.com)
- स्वाध्याय — शास्त्र-श्रवण, अध्ययन और आत्मचिंतन। ( jainworld.com)
- संयम — इंद्रियों और कषायों पर नियंत्रण। ( jainworld.com)
- तप — आत्मशुद्धि के लिए व्रत, उपवास और साधना। ( jainworld.com)
- दान — योग्य पात्र को दान देना और परोपकार करना। ( jainworld.com)
एक और सरल दृष्टि से, पर्युपासना को मन, वचन और काय से होने वाली श्रद्धापूर्ण सेवा भी माना जा सकता है। ( jainworld.jainworld.com)