Chhand puraan sansar vrushna ki upma
Answer
यदि आपका मतलब
“संसार” की उपमा से है, तो जैन दर्शन में संसार को
कर्म-बन्धन और जन्म-मृत्यु के निरंतर चक्र के रूप में समझाया गया है। जीव कर्म से बँधकर संसार में भटकता है, और उससे निकलने का मार्ग
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र बताया गया है। (
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Explanation
जैन परंपरा में संसार को केवल एक स्थान नहीं, बल्कि
भटकाव, दुख, जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म की अवस्था माना गया है। कुछ जैन ग्रंथों में इसे
“जीवन के समुद्र” की तरह भी समझाया गया है, जिसमें जीव बार-बार उतरता-चढ़ता है, और मोक्ष प्राप्त करना उस पार पहुँचना है। (
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Spiritual Understanding
इस उपमा का भाव यह है कि जब तक कर्मों का आस्रव और बंधन चलता रहता है, तब तक जीव संसार में ही रहता है। जैन धर्म का लक्ष्य इस बंधन को रोककर, कर्मों को क्षीण करके
मोक्ष प्राप्त करना है। (
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Takeaway
संक्षेप में, जैन दृष्टि से
संसार = कर्मों से बँधा हुआ जन्म-मृत्यु का चक्र है, और उससे बाहर निकलने का मार्ग
रत्नत्रय है। (
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