Tirthankro ne kaise karm bande aur kaise chhode
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Answer
तीर्थंकर भी पहले सामान्य जीव ही थे। उन्होंने भी पूर्व जन्मों में कर्म बाँधे, और फिर कठोर तप, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, और सम्यक चारित्र के द्वारा उन कर्मों को क्षय किया।Explanation
जैन धर्म के अनुसार कर्म बंधने के मुख्य कारण हैं:- मिथ्यात्व, यानी गलत दृष्टि
- अविरति, यानी संयम का अभाव
- प्रमाद, यानी असावधानी
- कषाय, यानी क्रोध, मान, माया, लोभ
- योग, यानी मन, वचन, काया की प्रवृत्ति
तीर्थंकरों ने भी पिछले जन्मों में, जब तक पूर्ण आत्मज्ञान नहीं हुआ था, तब तक कर्म बाँधे। लेकिन उन्होंने:
- हिंसा, असत्य, चोरी, ब्रह्मचर्य-भंग, और परिग्रह से दूरी रखी
- दीर्घ तपस्या की
- समता और क्षमा को धारण किया
- राग-द्वेष को धीरे-धीरे कम किया
- अंत में केवलज्ञान प्राप्त कर घातिया कर्मों का नाश किया
जब केवलज्ञान हो गया, तब नए कर्म नहीं बंधते। और शेष अघातिया कर्म भी आयु पूरी होने पर क्षय हो जाते हैं।
Spiritual Understanding
तीर्थंकरों का जीवन हमें यह सिखाता है कि:- कर्म कोई स्थायी बंधन नहीं हैं
- सही पुरुषार्थ से कर्म काटे जा सकते हैं
- कषाय ही सबसे बड़ा बंधन है
- आत्मा की शुद्धि से मुक्ति संभव है
तीर्थंकर मार्ग दिखाते हैं कि मनुष्य भी तप, संयम और समता से सिद्धि की ओर बढ़ सकता है।