दस अचरों मैं नो विरक किसके विरह मैं मगज की अस्थिरता को पाते है
Answer
आपका प्रश्न थोड़ा अस्पष्ट है। अगर आपका आशय जैन धर्म के
“दस धर्म” या
“नौ उपकषाय” से है, तो जैन परंपरा में दस धर्म
क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य माने जाते हैं। कषायों को बढ़ाने वाली नौ उपकषायें
हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद मानी गई हैं। (
encyclopediaofjainism.com)
Explanation
यदि आप “विरह” से “विरति” या “वैराग्य” कहना चाह रहे थे, तो जैन साधना का लक्ष्य मन को राग-द्वेष, कषाय और उपकषायों से हटाकर आत्म-स्थिरता की ओर ले जाना है। (
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Spiritual Understanding
जैन धर्म में वास्तविक स्थिरता बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सम्यक् दृष्टि और वैराग्य में मानी जाती है। साधक का प्रयत्न मन की चंचलता कम करके उसे आत्मा में टिकाने का होता है। (
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Takeaway
अगर आपका आशय किसी विशेष जैन सूत्र, धर्म, या व्रत से है, तो प्रश्न का शब्द-रूप थोड़ा स्पष्ट होने पर उसका सटीक अर्थ बताया जा सकता है।