105 BHED KOSKE HOTE HAI
जैन धर्म के अनुसार "105 भेद कोशके" (या "105 भेद") का उल्लेख मुख्य रूप से जैन आगम ग्रंथों में मिलता है। यहाँ "कोष्ठक" (कोशक/कोष्ठक/कोष्ठ) का अर्थ है भेद या विभाग। जैन धर्म में जीवों (सांसारिक प्राणियों) के 105 भेदों का वर्णन मिलता है।
इन 105 भेदों का वर्गीकरण इस प्रकार है:
- सामान्य वर्गीकरण:
जीवों को पहले दो श्रेणियों में बांटा गया है—स्थावर (एकेन्द्रिय) और त्रस (बहुेंद्रिय)।
- एकेन्द्रिय जीव (स्थावर, जिनके केवल एक इंद्रिय होती है):
- पृथ्वी-काय (Earth-bodied) - अप्-काय (Water-bodied) - तेजस-काय (Fire-bodied) - वायु-काय (Air-bodied) - वनस्पति-काय (Plant-bodied)
- बहुेंद्रिय जीव (त्रस, जिनमें दो से लेकर पाँच इंद्रियाँ होती हैं):
- द्वेन्द्रिय (two-sensed) - त्रेन्द्रिय (three-sensed) - चतुरेन्द्रिय (four-sensed) - पंचेन्द्रिय (five-sensed)
- इनकी और भी उपश्रेणियाँ बनती हैं, जिसमें नारी (female), नर (male), और नपुंसक (neuter) आदि के भेद, और नारक (hellish), तिर्यंच (animal), मनुष्य (human) एवं देव (celestial) के भेद भी आते हैं।
- अवस्थाएँ/संख्याएँ:
इन सभी का संयोग करके कुल 84 लाख (8.4 million) योनियाँ मानी जाती हैं, परंतु 105 भेद मुख्य रूप से स्थावर-त्रस और अन्य उपभेदों के योग से माने जाते हैं।
संक्षिप्त सारांश: 105 भेद जीवों के विभिन्न प्रकारों और श्रेणियों का गणितीय और तात्त्विक वर्गीकरण है, जिसे जैन आगमों में विस्तार से समझाया गया है। इसका उद्देश्य संसार में व्याप्त जीवों की विविधता का विवेचन करना है, जिससे अहिंसा व सम्यक् ज्ञान की भावना जागृत हो।
यदि आपको 105 भेदों की सूची विस्तार से चाहिए तो कृपया स्पष्ट करें ― कौन से 105 भेद (किस संदर्भ में) पूछ रहे हैं: जीवों के, कर्मों के, या किसी अन्य विषय के? जैन शास्त्रों में कई संदर्भों में '105 भेद' आते हैं, कृपया अपना प्रश्न स्पष्ट करें।