५ महाव्रत-हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह की विरति। ५ समिति-इर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और प्रतिष्ठापन। ५ इन्द्रिय-निरोध-पाँच इन्द्रियों के विषयों में इष्ट-अनिष्टपना न मानना। ६ आवश्यक-सामायिक, वन्दना, २४ तीर्थंकर की स्तुति, प्रतिक्रमण, स्वाध्य
Answer
यह सूची दिगम्बर जैन साधु के 28 मूल गुण की है। ये वे आवश्यक गुण हैं जिनका पालन करके मुनि संयम, तप और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलते हैं।Explanation
इन 28 मूल गुणों को तीन मुख्य भागों में समझा जा सकता है:1) पाँच महाव्रत
- अहिंसा — किसी भी जीव को मन, वचन, काय से कष्ट न देना
- सत्य — सदा सत्य का पालन
- अस्तेय — चोरी न करना
- ब्रह्मचर्य — पूर्ण संयम
- अपरिग्रह — किसी वस्तु में आसक्ति न रखना
2) पाँच समितियाँ
- ईर्या समिति — चलने में जीवों की रक्षा करना
- भाषा समिति — हित, मित, सत्य और मधुर वचन बोलना
- एषणा समिति — आहार ग्रहण में दोष से बचना
- आदान-निक्षेपण समिति — वस्तु उठाने-रखने में सावधानी
- प्रतिष्ठापन समिति — मल-मूत्र आदि का यथासंभव जीव-रहित स्थान पर विसर्जन
3) पाँच इन्द्रिय-निरोध
पाँचों इन्द्रियों के विषयों में इष्ट-अनिष्ट भाव न रखना, यानी राग-द्वेष से रहित रहना।4) छह आवश्यक
- सामायिक
- वंदना
- 24 तीर्थंकरों की स्तुति
- प्रतिक्रमण
- स्वाध्याय
- कायोत्सर्ग
5) शेष तप और नियम
- केशलोच — हाथों से केशों का लोंच
- अचेलपना — वस्त्र-परिग्रह का त्याग, दिगम्बर भाव
- अस्नानता — स्नान का त्याग
- भूमि-शयन — भूमि पर शयन
- अदंतधावन — दातुन/दाँत साफ़ न करना
- खड़े-खड़े आहार — खड़े होकर आहार ग्रहण
- एक बार आहार — दिन में एक बार ही आहार
Spiritual Understanding
इन 28 गुणों का उद्देश्य केवल बाहरी नियम नहीं है। इनका मूल भाव है:- संयम
- अहिंसा
- वैराग्य
- आत्मशुद्धि
- मोक्षमार्ग की साधना
दिगम्बर परंपरा में साधु जीवन को पूर्ण त्याग और पूर्ण जागरूकता का जीवन माना गया है। इसलिए ये गुण मुनि के आचरण, सोच और साधना को शुद्ध रखते हैं।