मुजने दोहलो उपन्यो बेसु गज अंबाडिये, सिंहासन पर बेसु चामर छत्र धराय, ते सहु लक्षण मुजने नंदन त्हारा तेजना, ते दिन संभारुने आनंद अंग न माय, हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे…..5 करतल पगतल लक्षण एक हजार ने आठ छे, तेहथी निश्चय जाण्या जिनवर श्री जगदीश, नंद
आपने जो पंक्तियाँ साझा की हैं, वे पारंपरिक जैन स्तुति (भजन/गीत) का हिस्सा लगती हैं, जिसमें भगवान महावीर के जन्म के समय माता त्रिशला द्वारा देखे गए १४ (या १६) शुभ स्वप्नों एवं नंदन नामक पुत्र (भगवान महावीर) के जन्म का उल्लासपूर्ण वर्णन किया गया है।
इन पंक्तियों में उल्लेख है कि माता त्रिशला ने अपने पुत्र (नंदन) को सिंहासन पर बैठे, चंवर और छत्र धारण किए हुए, उनके तेज और शुभ लक्षणों के साथ देखा। यहाँ ‘दोहलो’ यानी इच्छाएँ, ‘गज अंबाडिये’ यानी हाथी की सवारी, और ‘सहू लक्षण’ यानी शुभ चिन्हों का उल्लेख है, जो तीर्थंकर के जन्म के संकेत माने जाते हैं।
दूसरे छंद में ‘करतल पगतल लक्षण एक हजार ने आठ छे’—यह तीर्थंकर के हाथ-पैरों में १०८ विशेष शुभ लक्षणों का उल्लेख है। ‘नंदन जमणी जांघे लांछन सिंह बिराजतो’—यह तीर्थंकर के दाएँ जांघ पर सिंह का चिह्न, जो महावीर स्वामी का प्रमुख लांछन (निशान) है, दर्शाता है। ‘में तो पहेले स्वप्ने दिठो विसवावीस’—यह माता त्रिशला द्वारा देखे गए १४ या १६ स्वप्नों का उल्लेख है।
इस प्रकार, यह भजन भगवान महावीर के जन्म, उनके शुभ लक्षणों और माता त्रिशला के स्वप्नों के माध्यम से जैन धर्म के तीर्थंकरों की महिमा का गायन करता है। ऐसे भजन जैन समाज में गाए जाते हैं, विशेषकर महावीर जन्मकल्याणक जैसे पर्वों पर।
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