नंदन नवला बांधव नंदिवर्धनना तमे, नंदन भोजाईओना दियर छो सुकुमाल, हससे भोजाईओ कही दियर म्हारा लाडका, हससे रमशेने वळी चुंटी खणशे गाल, हससे रमशेने वळी ठुंसा देशे गाल, हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे…..7 नंदन नवला चेडा राजाना भाणेज छो, नंदन नवला पांचसे मा
यह सुंदर पद्य पारंपरिक लोकगीत जैसा प्रतीत होता है, जिसमें "नंदन" (लाडला बालक) के बारे में वात्सल्य भाव व्यक्त किया गया है। यह गीत आमतौर पर किसी विशेष सांस्कृतिक या पारिवारिक अवसर पर गाया जाता है, जैसे कि जन्मोत्सव या मंगल प्रसंग।
यदि आप इसका संबंध जैन धर्म से जानना चाहते हैं, तो जैन संस्कृति में भी बालकों के जन्म, उनके बचपन आदि को लेकर कई ऐसे गीत प्रचलित हैं जो परिवार में आनंद और मंगल का वातावरण बनाते हैं। जैन समाज में भी ऐसे लोकगीत या भजन गाए जाते हैं, जिनमें बच्चों के प्रति स्नेह और परिवार के सदस्यों की भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं।
हालाँकि, ये गीत सीधे जैन सिद्धांतों (तत्त्व, उपदेश, आचार आदि) से संबंधित नहीं हैं, परंतु जैन समाज की सांस्कृतिक धरोहर और पारिवारिक परंपराओं का हिस्सा हैं। जैन दर्शन में भी परिवार, स्नेह, शांति और सौहार्द को महत्व दिया गया है, लेकिन इन लोकगीतों का मुख्य उद्देश्य परिवार के भीतर प्यार और उत्सव का माहौल बनाना होता है।
अगर आपको इस गीत का जैन दृष्टि से कोई विशेष अर्थ या संदर्भ जानना है, तो कृपया स्पष्ट करें।