जैन ग्रंथ मोक्षपुरुषार्थ के अनुसार, रसासक्ति के कारण आचार्य मंगु शिथिलाचारी हो गए और कालधर्म पाकर व्यन्तरदेव हुए। बाद में उसी देवभाव से उन्होंने अपने पूर्व-पर्याय के शिष्यों को प्रतिबोध भी दिया। ( jainqq.org)
स्पष्टीकरण
अर्थात उनका अगला भाव व्यन्तरदेव का बताया गया है। ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि रसगृद्धि ने आर्य मंगु को पतन की ओर ले जाकर व्यन्तरदेव-गति तक पहुँचा दिया। ( jainqq.org)
आध्यात्मिक समझ
यह प्रसंग यह सिखाता है कि साधना में भी रसासक्ति बहुत बड़ा दोष है। छोटे-से लगने वाले विषय-लोलुपता भी संयम को कमजोर कर सकती है। ( jainqq.org)
निष्कर्ष
इसलिए आचार्य मंगु का अगला भाव व्यन्तरदेव बताया गया है। ( jainqq.org)