जैन कथा के अनुसार आचार्य मंगू का अगला भव यक्षयोनि में हुआ था। वे मथुरा नगर के यक्ष बने। ( jainqq.org)
Explanation
कथा में बताया गया है कि आचार्य मंगू रस-लोलुपता के कारण साधना में शिथिल हो गए। आयु पूर्ण होने पर वे उसी नगर के यक्षालय में यक्ष रूप में उत्पन्न हुए। बाद में उस यक्ष-रूप में उन्होंने अपने शिष्यों को अपनी भूल का अनुभव कराकर चेताया। ( jainqq.org)
Spiritual Understanding
यह प्रसंग जैन धर्म में संयम, आहार-शुद्धि और अनासक्ति का बहुत गहरा संदेश देता है। साधक के लिए स्वाद या सुविधा के प्रति आसक्ति साधना को कमजोर कर सकती है। ( jainqq.org)
Takeaway
इस कथा का सार यही है: रस की आसक्ति से बचो, और साधना में जागरूक रहो। ( jainqq.org)