सम्मेद शिखर जी रचना
सम्मेद शिखर जी (श्री सम्मेद शिखर जी, जिसे पारसनाथ पर्वत भी कहा जाता है) जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। यह झारखंड राज्य के गिरिडीह जिले में स्थित है। जैन मान्यता अनुसार, यहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था।
सम्मेद शिखर जी की रचना (इतिहास एवं महत्व):
- प्राचीनता: सम्मेद शिखर जी का उल्लेख जैन आगमों एवं पुराणों में मिलता है। यह तीर्थ स्थल अनादिकाल से अस्तित्व में है और जैन परंपरा के अनुसार, यहाँ पर 20 तीर्थंकरों ने अंतिम साधना कर मोक्ष प्राप्त किया।
- मुख्य रचना: यहाँ पर्वत की चोटी पर विभिन्न तीर्थंकरों के निर्वाण स्थल (जिनालय) स्थित हैं, जिन्हें "टोंक" कहा जाता है। प्रत्येक टोंक उस तीर्थंकर को समर्पित है जिनका यहाँ निर्वाण हुआ।
- टोंक और मंदिर: सम्मेद शिखर जी पर कुल 31 टोंक हैं, जिनमें से 20 तीर्थंकरों के हैं, और अन्य गणधर एवं साधुओं के। यहाँ मुख्य मंदिर भगवान पार्श्वनाथ (23वें तीर्थंकर) का है।
- रचना शैली: यहाँ के मंदिर जैन वास्तुकला के सुंदर उदाहरण हैं। संगमरमर और अन्य पत्थरों से बने ये मंदिर अत्यंत भव्य हैं।
- पारंपरिक यात्रा (पारसनाथ यात्रा): जैन श्रद्धालु यहाँ 27-30 किलोमीटर की पदयात्रा कर प्रत्येक टोंक के दर्शन करते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
- संवर्द्धन: समय-समय पर जैन समाज द्वारा यहाँ जीर्णोद्धार एवं नए मंदिरों का निर्माण होता रहा है।
संक्षिप्त इतिहास: सम्मेद शिखर जी की रचना किसी एक व्यक्ति या युग में नहीं हुई, बल्कि यह स्थल प्राकृतिक रूप से पर्वत पर स्थित था और जैन आचार्यों, साधुओं, एवं समाज द्वारा सदियों में यहाँ मंदिरों एवं टोंकों का निर्माण हुआ।
महत्व: यह तीर्थ जैन धर्म के पाँच प्रमुख तीर्थों (पंच तीर्थ) में सर्वोपरि है और मोक्षभूमि के रूप में पूज्य है।
स्रोत:
- जैन आगम ग्रंथ
- तीर्थ यात्रा मार्गदर्शिका
- जैन इतिहास ग्रंथ
यदि आप सम्मेद शिखर जी के किसी विशेष मंदिर, टोंक या निर्माण की जानकारी चाहते हैं, कृपया स्पष्ट करें।