सम्मेद शिखर जी में 20 तीर्थंकर क्यू मोक्ष गए
सम्मेद शिखर जी (जिसे पारसनाथ पर्वत भी कहा जाता है) जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। जैन मान्यता के अनुसार, वर्तमान अवसर्पिणी काल के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने सम्मेद शिखर जी पर्वत पर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था।
कारण: यह स्थल जैन धर्म के अनुसार अत्यंत पवित्र और ऊर्जा से युक्त माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि भगवान ऋषभदेव, नेमिनाथ, महावीर स्वामी और वासुपूज्य जी को छोड़कर बाकी 20 तीर्थंकरों ने इसी पर्वत पर अपने कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।
क्यों 20 तीर्थंकर यहीं मोक्ष गए? जैन ग्रंथों में ऐसा बताया गया है कि इन 20 तीर्थंकरों ने अपने अंतिम तप और साधना के लिए इस पर्वत को चुना, क्योंकि यह स्थान साधना के लिए सर्वोत्तम और शांत माना जाता है। यहाँ की पवित्रता तथा अनुकूल वातावरण ने उनके मोक्ष मार्ग को सुगम बनाया। प्रत्येक तीर्थंकर के निर्वाण स्थल का निर्धारण उनके पूर्व जन्मों के पुण्य, साधनास्थली, और ग्रह-नक्षत्र आदि के संयोग से होता है, जो शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है।
बाकी 4 तीर्थंकर कहाँ मोक्ष गए?
- ऋषभदेव: कैलाश पर्वत
- अजितनाथ, वासुपूज्य: सम्मेद शिखर जी
- नेमिनाथ: गिरनार पर्वत
- महावीर स्वामी: पावापुरी
सारांश: सम्मेद शिखर जी का विशेष आध्यात्मिक महत्व है, इसलिए 20 तीर्थंकरों ने वहीं मोक्ष प्राप्त किया। यह जैन धर्म का प्रमुख निर्वाण क्षेत्र है और यहाँ प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु तीर्थयात्रा के लिए आते हैं।