जैन धर्म , भगवान सुपार्श्वनाथ के वैराग्य का कारण
भगवान सुपार्श्वनाथ, जो जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर हैं, उनके वैराग्य (संसार से विरक्ति) का कारण जैन ग्रंथों के अनुसार इस प्रकार है:
भगवान सुपार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी (काशी) के राजा प्रभावसेन और रानी प्रसन्नमती के यहां हुआ था। युवावस्था में वे राजसी सुख-सुविधाओं में रहते हुए भी संसार की नश्वरता और जीवन-मृत्यु के चक्र से चिंतित रहते थे।
वैराग्य का प्रमुख कारण: एक बार भगवान सुपार्श्वनाथ ने देखा कि एक श्रमिक जंगल में लकड़ी काट रहा है। उसने एक बड़ा वृक्ष गिराया, जिसमें एक सर्पिणी (मादा नाग) और उसके अंडे दब कर मर गए। यह देखकर सुपार्श्वनाथ को गहरा दुःख हुआ और उन्होंने विचार किया कि यह संसार कितना असार (नश्वर) और हिंसा से भरा हुआ है। जीवन में अनजाने में भी इतनी हिंसा हो जाती है, और जीवों को कष्ट पहुंचता है।
इस घटना ने उनके मन में घोर वैराग्य उत्पन्न कर दिया और वे संसार के मोह-माया, भोग-विलास तथा हिंसा से मुक्ति पाने का निश्चय कर तपस्या और आत्मकल्याण के मार्ग पर चल पड़े। बाद में, उन्होंने दीक्षा लेकर दीर्घकालीन तपस्या की और केवलज्ञान प्राप्त किया।
सारांश: भगवान सुपार्श्वनाथ के वैराग्य का मुख्य कारण संसार की नश्वरता का बोध एवं प्राणीमात्र की अनजानी हिंसा को देखकर करुणा एवं वैराग्य का उदय होना था।