माता त्रिशला ज़ुलावे पुत्र पारणे…., गावे हालो हालो हालरवाना गीत, सोना-रुपाने वळी रतने जडियु पारणु… रेशम दोरी घुघरी वागे छुम छुम रित… हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे…..1 जिनजी पार्श्व प्रभुथी वरश अढीसे अंतरे, होंसे चोविसमो तीर्थंकर जिन परिमाण, केशी स्व
Answer
यह भगवान महावीर स्वामी के जन्म प्रसंग से जुड़ा “माता त्रिशला का हालरू / हालरवाना गीत” है। इसमें माता त्रिशला अपने पुत्र वर्धमान महावीर को पारणे में झुलाते हुए प्रेम, आनंद और मंगलभाव से गाती हैं।
यह रचना भक्तिभाव से भरी हुई है और भगवान महावीर के जन्म, माता त्रिशला के चौदह स्वप्न, तीर्थंकरत्व के संकेत, इंद्रों द्वारा जन्माभिषेक, तथा राजकुल में हुए आनंद का वर्णन करती है।
Explanation
इस हालरू में मुख्य भाव इस प्रकार हैं:
- माता त्रिशला का वात्सल्य: माता अपने पुत्र को सोने-चांदी और रत्नों से जड़े पारणे में झुलाती हैं।
- चौदह स्वप्नों का संकेत: माता त्रिशला ने जो मंगल स्वप्न देखे, वे तीर्थंकर के जन्म का शुभ संकेत माने जाते हैं।
- चौबीसवें तीर्थंकर का आगमन: गीत में यह भाव है कि भगवान पार्श्वनाथ के बाद अब चौबीसवें तीर्थंकर का अवतरण हुआ है।
- भगवान महावीर की महिमा: उन्हें तीनों लोकों के शिरताज, जीवों को तारने वाले, और संघ-तीर्थ की लाज कहा गया है।
- जन्मकल्याणक का वर्णन: देवों द्वारा मेरु पर्वत पर प्रभु का जन्माभिषेक करने की भावना भी आती है।
- लोकभाव और मातृभाव: कई पदों में मामा-मामी, संबंधी, आभूषण, खिलौने, शिक्षा और विवाह जैसी लोकरीति का सुंदर वर्णन है। यह माता के स्नेहपूर्ण कल्पना-भाव को दर्शाता है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में तीर्थंकर का जन्म केवल पारिवारिक आनंद का प्रसंग नहीं, बल्कि समस्त लोक के लिए मंगलकारी घटना माना जाता है। भगवान महावीर का जन्म जीवों को धर्ममार्ग दिखाने, अहिंसा, संयम, अपरिग्रह और आत्मकल्याण का संदेश देने के लिए हुआ।
इस हालरू में माता त्रिशला का वात्सल्य तो है ही, साथ ही यह भी भाव है कि यह बालक सामान्य राजकुमार नहीं, बल्कि भावी तीर्थंकर हैं।
Takeaway
यह हालरू भगवान महावीर स्वामी के प्रति भक्ति, माता त्रिशला के मातृप्रेम और तीर्थंकर जन्मकल्याणक की मंगल भावना को व्यक्त करता है। इसे गाते समय केवल लोरी का भाव नहीं, बल्कि प्रभु के आगमन का आनंद और आत्मकल्याण की प्रेरणा भी मन में रखनी चाहिए।