नवे गुण स्तान का दूसरा नाम
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उत्तर
जैन धर्म में नवें गुणस्थान का दूसरा नाम है:
अनिवृत्ति-बादर-संपराय गुणस्थान
इसे संस्कृत/प्राकृत परंपरा में सामान्यतः अनिवृत्तिकरण गुणस्थान भी कहा जाता है।
सरल अर्थ
इस अवस्था में साधक के कषाय बहुत सूक्ष्म होने लगते हैं, लेकिन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। साधक आत्म-शुद्धि की ऊँची अवस्था में आगे बढ़ रहा होता है।