नवे गुणस्तान का दूसरा हिस्सा
उत्तर
जैन धर्म में नवाँ गुणस्थान का नाम अनिवृत्ति-बादर-साम्पराय गुणस्थान है।
इसके “दूसरे हिस्से” से सामान्यतः आशय यह हो सकता है कि इस गुणस्थान में साधक की कषायें बहुत सूक्ष्म होती जाती हैं, लेकिन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई होतीं।
समझ
नवाँ गुणस्थान वह अवस्था है जहाँ साधक:
- अत्यंत उच्च आध्यात्मिक प्रगति पर होता है।
- चारित्र मोहनीय कर्म की कषायों को बहुत अधिक घटा चुका होता है।
- स्थूल कषायें अत्यंत मंद हो जाती हैं।
- फिर भी कुछ सूक्ष्म साम्पराय अर्थात राग-द्वेष का अति सूक्ष्म अंश शेष रहता है।
इसके बाद साधक दसवें गुणस्थान में पहुँचता है, जिसे सूक्ष्म-साम्पराय गुणस्थान कहा जाता है।
आध्यात्मिक भाव
नवाँ गुणस्थान यह बताता है कि आत्मा बहुत निर्मल अवस्था के निकट पहुँच गई है, परंतु मोक्षमार्ग में अत्यंत सूक्ष्म कषाय भी बाधक होती है। इसलिए साधक को पूर्ण वीतरागता की ओर आगे बढ़ना होता है।
सार
नवाँ गुणस्थान आत्मा की अत्यंत ऊँची साधना-अवस्था है, जहाँ स्थूल कषायें लगभग शांत हो चुकी होती हैं, लेकिन सूक्ष्म राग-द्वेष अभी शेष रहता है।