तेल , घी आदि को क्या कह
जैन धर्म के अनुसार, तेल, घी आदि को "अभक्ष्य" (जो खाने योग्य नहीं है) या "विगई" (अत्यधिक सावधानी से सेवन योग्य) पदार्थों की श्रेणी में रखा जाता है, विशेष रूप से श्रावक (गृहस्थ) और मुनि (साधु-साध्वी) के लिए। इन पदार्थों में सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है, जैसे तिल तेल, घी, दूध, दही, मक्खन आदि।
जैन आगमों के अनुसार, साधु-साध्वियाँ इन पदार्थों का त्याग करते हैं, क्योंकि इनमें अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीव (एकेन्द्रिय प्राणी) होते हैं और इनका सेवन हिंसा का कारण बन सकता है। श्रावकों को भी इनका सेवन सीमित और सावधानीपूर्वक करने की सलाह दी जाती है।
सारांश: तेल, घी आदि को जैन धर्म में "सत्त्व" (जिसमें जीव होते हैं) पदार्थ कहते हैं, जिनका त्याग या सीमित उपयोग अहिंसा और संयम के पालन हेतु आवश्यक माना गया है।