खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमन्तु मे। मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणई। एवमहं आलोइय, निंदिय गरिहियं दुग्गिछियं सम्मं। तिविहेण पडिक्कंतो, वंदामि जिण-चउव्वीसं॥
अर्थ
यह क्षमापना और मैत्री-भाव की अत्यंत पवित्र भावना है।
“खामेमि सव्वे जीवा” मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ।
“सव्वे जीवा खमन्तु मे” सभी जीव मुझे क्षमा करें।
“मित्ती मे सव्वभूएसु” सभी प्राणियों के प्रति मेरा मैत्री-भाव हो।
“वेरं मज्झं न केणई” मेरा किसी भी जीव के साथ वैर न हो।
“एवमहं आलोइय, निंदिय गरिहियं दुग्गिछियं सम्मं” इस प्रकार मैं अपने दोषों की आलोचना करता हूँ, उन्हें निंदनीय और त्याज्य मानता हूँ, और उनसे विरक्त होता हूँ।
“तिविहेण पडिक्कंतो” मैं मन, वचन और काया—इन तीनों से किए गए पापों का प्रतिक्रमण करता हूँ।
“वंदामि जिण-चउव्वीसं” मैं चौबीस जिनेश्वर भगवानों को वंदन करता हूँ।
भावार्थ
इस गाथा में साधक सभी जीवों के प्रति क्षमा, मैत्री और अवैर-भाव प्रकट करता है। वह अपने जाने-अनजाने हुए अपराधों, हिंसा, कटु वचन, गलत विचार और अशुभ आचरण के लिए पश्चाताप करता है और उन्हें छोड़ने का संकल्प करता है।
आध्यात्मिक महत्व
जैन धर्म में क्षमा केवल शब्द नहीं, आत्म-शुद्धि का मार्ग है। जब मन से वैर, क्रोध, अहंकार और द्वेष कम होते हैं, तब आत्मा हल्की और निर्मल बनती है।
यह भावना हमें सिखाती है:
- सब जीवों के प्रति करुणा रखना।
- किसी से वैर न रखना।
- अपने दोषों को स्वीकार कर सुधार करना।
- मन, वचन और काया को पवित्र बनाना।
Takeaway
इस गाथा का सार है: “मैं सबको क्षमा करता हूँ, सब मुझे क्षमा करें; मेरा सभी जीवों से मैत्री-भाव हो और किसी से वैर न हो।”